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कविता-मैं,अँधेरा और दुख

बृजेश कुमार 'ब्रज'बृजेश कुमार 'ब्रज' February 3, 2022
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अक्सर बैठ जाता 
दरवाजा बत्तियां
बंद कर
अँधेरों से भरे कमरे में
कि शायद
वो न देख सकेगा
अब पहुँच से बाहर हूँ
उसकी
लेकिन कुछ ही
समय पश्चात
छलक उठता
वो
पलकों की कोर से
तब अहसास होता
वो रचा बसा 
बहुत गहरे
अस्तित्व बन कर
और जब छोड़ देती
दुनिया
अँधेरों में घुटने के लिए
तब एक मात्र
वह
'दुख' ही तो है
जो समेट लेता 
अपने आगोश में
मुझे...
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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