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ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल

बृजेश कुमार 'ब्रज'बृजेश कुमार 'ब्रज' December 15, 2021
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जरा सा  मसअला है  ये  नहीं  तकरार  के  क़ाबिल
किनारा  हो नहीं  सकता कभी मझधार के  क़ाबिल

न  ये  संसार  है  मेरे  किसी  भी  काम का  हमदम
नहीं  हूँ  मैं  किसी भी  तौर  से  संसार  के  क़ाबिल

न  मेरी   पीर  है  ऐसी   जिसे  दिल   में  रखे  कोई
न  मेरी  भावनायें  हैं   किसी   आभार   के  क़ाबिल

ये  मुमकिन  है  ज़माने  में  हंसी  तुझसे  ज़ियादा  हों
सिवा  तेरे  नहीं   कोई   मेरे  अश'आर   के  क़ाबिल

मेरे आँसू  तुम्हारी  आँखों  से  बहते   तो  अच्छा  था
मगर  ये अश्क़ भी तो  हों तेरे  रुख़सार  के  क़ाबिल

न  जाने  क्यों  बहारें   इस  कदर  से  रूठ कर  बैठीं

नहीं तो ज़ीस्त थी 'ब्रज' की गुल-ए-गुलज़ार के क़ाबिल

बृजेश कुमार 'ब्रज'

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