ग़ज़ल-सूख जाएं's image
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नदी  जलहीन  होगी  कूप  सारे  सूख  जायें
अगर  ये आँख  के आँसू  हमारे  सूख  जायें

ग़रीबी  भुखमरी  से  हे  विधाता  तंग आकर
न  बस्ती  के  चमकते  चाँद  तारे सूख जायें

कि  जैसे  जल  रहे हैं गुर्बतों  की आग में वो
समंदर  भी जले  उसके  किनारे  सूख जायें

तड़पना रीत है जग की तो फिर ये बद्दुआ है   
रहे  नफ़रत  जहाँ  में  प्रेम  धारे  सूख  जायें

न कोई मोल 'ब्रज' होता न इनकी है ज़रूरत
तो अच्छा  हो कि सच्चे भाव  सारे सूख जायें
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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