ग़ज़ल-दिल का दर्द's image
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नफ़रत  के बाज़ार  सजे हैं प्रेम डगर पर पहरा  है
दिल का दर्द जुबां से होकर आँखों में आ ठहरा  है

उसका आना स्वर्ग सरीका उसका जाना लुट जाना
उसकी  ख़ामोशी  है क़ातिल  सन्नाटा  भी गहरा  है

मेरी  आँखों  में आ बैठा उसकी  आँखों  का  पानी
भीगी आँखों  से फिर देखा  उसका रंग  सुनहरा है

उसको  बिसराने की ख़ातिर आवारा बन फिरता हूँ
उसका अक्स नुमायाँ हर सू क्या बस्ती क्या सहरा है

होंठो को ख़ामोशी दे दी कुछ धमकी दे कुछ कसमें   
प्रेम विधा की वो प्रोफ़ेसर 'ब्रज' का ज्ञान ककहरा है

बृजेश कुमार 'ब्रज' 

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