उपनिषद् गीत's image
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स्वतः अंतः से सबकुछ पूँछ लीजै,
हमें श्रुतियों ने ऐसा है बताया ।
मेरा संबंध क्या परमात्मा से ?
अहो ! कैसा ये संशय मन में आया ।

जिसे मिलने की आशा ही नहीं थी,
उसे पाने का अब बीड़ा उठाया ।
परम्-हंसों का जोड़ा मीत बनता,
शशक-चित्रक का नाता बन न पाया ।

हरि ! मैं क्षीण हूं, अल्पज्ञ भी हूं,‌
जो इस सर्वज्ञता को है भुलाया ।
मैं माया भोगता हूं, साक्षी हो तुम,
मैं एकाकी हूं, तू सब में समाया ।

हरि ! हैं उपनिषद उद्घोष करते,
कहा है - 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' ।
श्रुति-माँ कह रही है मीत हैं हम,
समान इक संग बैठे हैं बताया ।

'ब्रजेश्' अब द्वार पर मैं आ रुका हूं,
समझ लो वो सुदामा फिर से आया ।
चरण-रज-रेणुका कुछ दान कर दो ,
इसी आशा में निज-मस्तक नवाया ।

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