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गांव शहर में भी बसता तन से न सही मन से मानें

bhishmsharma95bhishmsharma95 October 21, 2022
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हम गाँवों के गबरू हैं तुम सा 

शहर में जीना क्या जानें।

है गांव शहर में भी बसता तन

से न सही मन से मानें।

बस सूखी रोटी खाई है तुम सा शहद

में पला नहीं।

हमने न झेली न टाली ऐसी भी 

कोई बला नहीं।

हमने न पेड़ से खाया हो फल

ऐसा कोई फला नहीं।

तब तक सिर को दे मारा है जब

तलक पहाड़ भी टला नहीं।

सिर मत्थापच्ची करते जब तुम 

थे भरते लंबी तानें।

हम गाँवों -----

दिल-जान से बात हमेशा की तुम

सी घुटन में जिया नहीं।

है प्यार बाँट कर पाया भी नफ़रत

का प्याला पिया नहीं।

इक काम जगत में नहीं कोई भी

हमने है जो किया नहीं।

है मजा नहीं ऐसा कोई भी

हमने हो जो लिया नहीं।

फिर अन्न-भरे खेतों में खड़ के

दाना-दाना क्यों छानें।

हम गाँवों के ----

है इज्जत की परवाह नहीं 

बेइज्जत हो कर पले बढ़े।

अपनों की खातिर अपने सर 

सबके तो ही इल्जाम मढ़े।

कागज की दुनिया में खोकर भी 

वेद-पुराण बहुत ही पढ़े।

हैं असली जग में भी इतरा कर

खूब तपे और खूब कढ़े।

बस बीज को बोते जाना था कि

स्वर्ण कलश मिलते न गढ़े

इस सोच के ही बलबूते हम तो 

हर पल निशदिन आगे बढ़े।

फिर छोटा मकसद ठुकरा कर हम

लक्ष्य बड़ा क्यों न ठानें।

हम गाँवों के -----

जो शहर न होते फिर अपनी हम

काबिलियत को न पाते।

रहते अगर न वहाँ तो क्या है 

घुटन पता कैसे पाते।

न लोकतंत्र से जीते गर ये 

नियम-व्यवस्था न ढाते।

फिर बेर फली तरु न भाते गर 

भेल पकौड़े न खाते।

हम साइलेंट जोन में न बसते तो 

घाट मुरलिया न गाते।

हम रिमझिम स्नान भी न करते गर

नगर में न तनते छाते।

है रात के बाद सुबह आती तम से ही

लौ दमखम पाती।

है सुखदुख का चरखा चलता वह

न देखे जाति-पाति।

फिर अहम को अपने छोड़ के हम यह

सत्य नियम क्यों न मानें।

हम गाँवों ----

है ढोल-गंवार यही कहते बस 

तुलसी ताड़न-अधिकारी।

है अन्न उगाता जो निशदिन वो 

कैसे है कम अधि-कारी।

जो दुनिया की खातिर जाता हो 

खेतों पर ही बलिहारी।

वो कम कैसे सबसे बढ़कर वो 

तो मस्ती में अविकारी।

फिर ऊंच-नीच ठुकरा क्यों न हम

इक ही अलख को पहचानें।

हम गाँवों ---

~@bhishmsharma95

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