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वो गोरी.....

मातपिता चंचल तितली
उछलीमचली वो कितनी
राज ना कोई बात आज
ना कोई है नाराज आज
तज पीहर वो चली आज

तोड़ सारे ये रीति रिवाज
कर सोलहो श्रृंगार साज
मुख पर ओढ़ चुनर लाज
पग पग करती यूं लिहाज
तज पीहर वो चली आज

बाबूजी की वो चिट्ठियां सहेज
रखी उसने उसका यही दहेज !
जीवन भर की पूंजी थी वह
सफलता की कुंजी थी वह
सज पीहर वो चली आज!!

डा भारती बिंदु 


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