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हे दीपशिखा!
आज तूं भी मेरे संग जल!
बाती संग संग
आज ये श्रृंगार भी रहा सुलग!
पी न आए
तन्हाइयां ये काटे प्रति पल!
रात्रि गहरी
बैचेनियां करती जाय छल!
तूं साक्षी
मेरे समय की कर मुझे सबल!
विराहाग्नि जलूंगी
तूं भी मेरी सखि!संग संग जल!

डा भारती बिंदु 

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