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उदास है मोहल्ले वाली बारिश का पानी..

Badri Nath KoiriBadri Nath Koiri September 24, 2022
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बूंदे कह रही है बादल से एक कहानी 
उदास है मोहल्ले वाली बारिश का पानी,
देख कर चले जाते है नन्हे मुन्ने हस्तियां
अब नही तैराते है कागज की कश्तियां,
आज फंसे पड़े है डूब कर समझदारी के दलदल में
ना चलने पर कश्ती, जो फूंक मारते थे पल-पल में,
कहीं किसी कोने में पड़ी यादों की एक फाईल बन गईं 
अब तो आलम यह है वह कागज़ भी मोबाईल बन गईं ,
भर सको तो भर दो, जो हुए है घाव मुझपर
आओ फिर से चलाओ, कागज की नाव मुझपर 
ढूंढ रहा हूं वह नन्हे मुन्ने हाथ
जो जगा दे सोई हुई मेरी यादें पुरानी,
बूंदे कह रही है बादल से यह कहानी 
उदास है मोहल्ले वाली बारिश का पानी।


देखा कहीं पानी का जमाव जो
दौड़े भागे चले आते थे पांव जो
कभी मस्तियां, उछलकूद मुझपर अपने पांव डाल कर
कभी किताबो से कागज़ का एक पन्ना निकाल कर
फिर उस कागज़ से कश्ती तैयार करते थे
कैसे भुला दूं, तैराकर मुझमें जो प्यार भरते थे
अब तो भय का मंजर रहता है
बीमार होने का भी डर रहता है 
आके कोई सुना दे वह गज़ले 
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी
बूंदे कह रही है बादल से यह कहानी 
उदास है मोहल्ले वाली बारिश का पानी।

--- बद्री नाथ कोईरी ‘बादल’

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