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जिस्म के पैंतीस टुकड़े

Badri Nath KoiriBadri Nath Koiri November 20, 2022
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क्या रूह चुप था महज गवाही के लिए
के बेनकाब कातिलों के मुखड़े हो जाए ,

या फिर न्याय की लहरे ऊंची हो 
इकाई दहाई सी आवाजे सैकड़े हो जाए ,

या मोहब्बत ही कुछ ऐसी होती है
जिसमें जिस्म के पैंतीस टुकड़े हो जाए ।


ऐसी भी क्या इश्क पंक्षी की 
उसे मालूम ही ना हो कब बंद पिजड़े हो जाए ,

फिर शायद कोई मीरा जन्म ही ना ले
कागज़ें प्रेम के गर चिथड़े चिथड़े हो जाए ,

यार ऐसी कोई मोहब्बत ना करना
जिसमें जिस्म के पैंतीस टुकड़े हो जाए ।

               --बादल 

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