मैंढक से जन's image
Poetry3 min read

मैंढक से जन

babu635062babu635062 August 24, 2022
Share0 Bookmarks 27 Reads1 Likes
ये मैंढक मिट्टी से 
ढंककर  अपने तन को 
ये टर टर की रट 
बहुत जोर की लगाते है ।

ये कुछ जन ठहर ठहर कर 
हर वर्ष अपना हर्ष बढ़ाते हैं
ये कुछ जन इसके लिए यहां 
दूसरों को चोट गहरी पहुंचाते हैं 

इनके टर टर की रट सुन
मेघ अपनी सुध बुध खोकर
अम्बर पर से यहां 
जमीं पर बरस जाते हैं ।

ये कुछ जन मन में सोच सोच कर 
अपना अहित करने लग जाते हैं
परहित करके अपना हित साधने में
ये कुछ जन बहुत हद तक गिर जाते हैं ।

मेंढक की रट सुन 
कोयल कुहकना छोड़ देती है
इनके तीखे स्वर की तीव्रता में भला 
मधुर धुन कहां सुनाई दे पाती है।

इन कुछ जन के नव करने की कल्पना
अनेक जन को मन ही मन जलाती है
इन कुछ जनों के काले कारनामों से 
पूरी मानव जाति बदनाम हो जाती है ।

मिट्टी का तन मिट्टी में मिलेगा
इस बात से मेंढक व जन अनजान हैं
इसलिए तो तीखे स्वर से 
करते रहते सबको परेशान हैं ।

कुछ क्षण की ही बात है
आज का कल में बनेगा इतिहास 
इतने में  मीठी वाणी बोलने से
किसी का कुछ भी नहीं होता नुकसान ।

मिट जाता है यह तीखा स्वर 
जब बुंदे बारिश की बरस जाती है 
जिसे पाने को तरसते हैं मेंढक 
पानी रूपी रस के पाने से मौन हो जातें हैं।

मिट जायें जन जन में भेद
जब जानें की हर जन में है महेश
क्या रमेश क्या सुरेश और क्या कमलेश
सब के अंदर बसते है एक ही परम ईश ।


बारिश से मिट्टी हटने पर बाहर निकले मेंढक 
हमें इधर उधर बहुत से नजर आ जाते हैं 
रस पाने से  सरस बन कर 
इधर उधर कूदते नजर आते हैं ।

गुरु के ज्ञान से अज्ञान हटने पर 
ज्ञान के मार्ग बहुतसों के खुल जाते हैं 
पर गुरु मिलने पर भी कुछ जन
उनके अनुसार नहीं चल पाते हैं ।


ऐसे कुछ जन देखकर 
हम नजरें झुका लेते हैं
वो चल रहे अपनी धुन में
हम उनके लिए है बहुत ही तुच्छ ।

उदासी में अपने चेहरे को
सबकी नजरों से छिपाने वाले
मन की हंसी मिलने पर 
सबके सामने नजर आ ही जाते है ।

इतने मेंढक देखकर 
हम तो बचपन में यहीं सोचते रहे थे 
कि समुंदर से पानी भरते हुए मेघ
अपने संग इतने मेंढक कैसे खींच लाते हैं ।

जब बरसती है बारिश की बूंदें
तब बारिश की बुंदों संग कितने 
मेंढक देखो इतनी  ऊंचाई से
गिरकर कैसे जिवित रह जाते हैं।

जब गरज होता है किसी को
तब बोल मीठे अपने आप निकल जाते हैं
कुछ जन है जो मुंह में राम बगल में छूरी रखकर 
जनों के मन को हराने का कारोबार कर जाते हैं ।


ये मेंढक मिट्टी से
ढंककर अपने तन को 
ये टर टर की रट
बहुत जोर की लगाते है।

ये कुछ जन ठहर ठहर कर 
हर वर्ष अपना हर्ष बढ़ाते हैं
ये कुछ जन इसके लिए यहां 
दूसरों को चोट गहरी पहुंचाते हैं ।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts