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Romantic PoetryPoetry1 min read

हाफ़िज़ा ही सही

AvviAvvi March 1, 2022
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मुक़द्दर वो न हुए, तो ना ही सही...

हमारा एक हसीं, हाफ़िज़ा ही सही... 

 

न वो लौटेगा, ना वो गया वक्त,

याद आने को भुला बिसरा ही सही...

 

रक़ीब की फ़िक्र निहायत रखते है वो,

हमारे लिए कुछ बे-परवाह ही सही...

 

जीनत-ए-महफ़िल-ए-तसव्वुर आबाद है,

दर-हक़ीक़त हम ठहरे तन्हा ही सही...

 

मंजिल-ए-मक़सूद हो उसको मुबारक़,

दर-ब-दर भटकते हम गुमराह ही सही...

 

बद-अंजाम फक्त हमारे हिस्से “अवी”

वो थे और रहेंगे, बे-गुनाह ही सही...



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