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Kumar VishwasPoetry3 min read

...... बेजुबां से रह गए।

Avish DattAvish Datt November 8, 2022
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हम जानते थे एक दूजे को,थोड़ा बहुत सही से।

आस पास रहे एक दूजे के, कुछ पल को ही मगर तकलीफ से। 

जो वक्त था साथ मैं,थोड़ा हंसे और थोड़ा लड़ते रहे।

मालूम था हम दोनों को, वो खुद में रहने के एहसास का।

फिर भी सब कुछ जान के, अनजान बने रह गए।

शायद मिलना ही नहीं था हमारे नसीब में,

इसलिए हर बार करीब होके भी, बेजुबान से रह गए।




वो जो गुजरना होता था, हर बार तेरे ठिकाने से,

बस एक झलक तेरे चहरे की न जाने कब से तरस रही।

मेरी मौजूदगी की खबर तूने भी हर बार रखी है।

रूबरू होंगे उस घड़ी की इंतजार में,तेरी आंखे भी तक रहीं हैं।

वो मालूम था हम दोनों को, खुद में रहने के एहसास का।

शायद मिलना ही नहीं था हमारे नसीब में, 

इसलिए हर बार करीब होके भी, बेजुबान से रह गए।




कुछ यादें साथ बनी थी, 

धुंधली ही सही मगर वो याद, कभी याद तो आई होगी।

भले ही गुमनाम रखे खुद को,एक दूजे के एहसासों से।

उभर आऐ कई हिस्से फिर, जो सुला दिए थे खयालों से।

वो नाम कही से जो गूंज उठा, कही भीड़ से ,कभी परायों से।

सुन के अन सुना और सब नज़र अंदाज़ करते गए 

शायद मिलना ही नहीं था हमारे नसीब में, 

इसलिए हर बार करीब होके भी, बेजुबान से रह गए।



अब क्या कभी मुलाकात होगी।

हाल चाल ही सही,कुछ पल की बात चीत भी होगी।

वो कुछ ख़्वाब सझा के अब भी रखें है,

जो हमने साथ देखे थे।

वो सब जज़्बात संभाल के अब भी रखें है,

जो तुझ संग जुड़ चुके थे।

शायद वो रिश्ता न हो, जो था कभी पहले।

अब क्या अजनबी बनने की अदाकारी भी नहीं होगी।

वो तेरी खुशबू अब भी, मेरे रूह में महक रही हैं।

मेरी वो बुशर्ट भी हर शाम, तेरे बदन का साथ दे रही हैं।

चलों एक इत्तेफ़ाक ही सही, कभी अगर हम मिल भी गए कही , 

पहचान जरूर लेना, फिर चाहे भले ही मुह फेर लेना।

मैं याद हूं अब भी तुम्हें, सोच के मैं बाकी उम्र गुजार लुंगा।




जुदा हो गए हैं, दूर हो गए हैं।

कहा हैं हम, कैसे हैं हम? 

एक दूजे की तबियत से, बेखबर हो गए है हम।

ऐसे कई सवाल हम दोनों, खुद में बांधे हुए हैं।

और जवाब हर बार एक दूजे की दहलीज में छोड़ देते हैं।

अब सिर्फ एक उम्मीद है और बस एक उम्र तक इंतजार।

आधी उम्र गुज़र गई और अब आधी से हैं दरख्वास्त।

उसके दफन होने से पहले, उसकी हसी का दीदार करा देना।

मेरे राख होने से पहले, उसको मेरी नज़र से मिला देना।

जीते जी शायद मिलना ही नहीं था हमारे नसीब में, 

इसलिए तो हर बार करीब होके भी, हम बेजुबान से रह गए।























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