आखिर क्यों??'s image
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हम इस संसार में एक मानव रूपी शरीर में जन्में, जो सभी प्रजातियों में सबसे ज्यादा समझदार और सभ्य माना जाता हैं।

लेकिन अब कुछ ऐसा हैं,की ये सबसे बुद्धिमान जाति की बुद्धि थोड़ा अपने अलग राह में मुड़ गई हैं।

हमारे इस मानव शरीर में अनेकों भाव उत्त्पन्न होते हैं,जिस कारण ही हम हर एक प्रजाति से जुड़ी मानसिक, शारीरिक,और सामाजिक चाल चलन को जान और समझ पाते हैं। 

परंतु अब भावनाएं सिर्फ सीमित हो गई हैं। 

सीमित अपने परिवार,परिजन,रिश्तेदार,दोस्त और कुछ अलग से बनाए हुए नायाब ख़ास लोग। बस.

लेकिन ऐसा क्यों???

हम भूल जातें है या नज़रंदाज़ करते करते पूरे अंजान बन गए है।

ये दुनियां लगभग नहीं भी तो 700 800 करोड़ के मानवों से ऊपर की है,जिसमे से नहीं भी तो एक इंसान के आस पास कम से कम 100 लोग उनकी आंखों की, मस्तिष्क की रेखाओं में घूमते रहते हैं। 


लेकिन हमारा ध्यान,हमारी सोच,हमारी मनोदशा अब उन सबको सिर्फ और सिर्फ नज़रंदाज़ के बोरे में बंद कर चुके हैं।

दुनिया का एक रिवाज हैं की 

आप को कुछ पाना है तो आपको थोड़ा उस तक आना पड़ेगा और थोड़ा वो जिसे आप पाना चाहते हो वो आप तक आयेगा।

लेकिन अब ऐसा होता नहीं हैं। 

अगर किसी वजह से मिल गया तो खुश वरना क़िस्मत,भाग्य है कोसने को। लेकिन फिर भी हम वो एक भाव सीखते नही जिससे चीजे संभले,सुधरी और निखर के कुछ नया अनुभव करे।

आज हम मानव का एक सम्बंध जो लड़का लड़की के बीच ,या समलैंगिक होता हैं, जोकि अधिकतर आकर्षण, रुचि, समझौता ,संभोग और प्रेम से मिलकर बना होता हैं, मगर सिर्फ अहमियत उस संबंध एक अधिकांश भाग के हिस्से को दिया जाता हैं, जो सिर्फ दोनों पक्षों को आपसी सुख और हिस्सेदारी में मिलता है।

अब इन ख़ुद के सुखद भाव के बनाए हुए इन रिश्तों में भी तनाव, रंगिशे,मतभेद उत्तपन होना शुरू हो जाता हैं। और बिना उस रिश्ते की किसी गरिमा,आदर किए वो वही खत्म और निपट जाता हैं।

वो जो भी भाव से किसी एक रिश्ते जो जोड़ा था, बिना वो भाव की कदर करे उस संबंध का एक नया नाम घोषित हो जाता हैं। क्यों??

और फिर हम अपने आस पास कुछ नहीं देखते और ना समझते। हमारे लिए वोही एक दुनिया थी बस। बाक़ी हमें ये दुनिया खराब, जालसाजी, और बेकाम सी महसूस होने लगती हैं।वो दो के बीच के आपस की वजह से सभी यानी मैं,तुम, जो सही है वो भी और गलत है वो भी । सब आंखो में किसी न किसी भाव से ग्राषित होकर खटकने लगते हैं। क्यों???


हम इंसान अपने अगल बगल की चलती हुई भीड़ यानी समाज को ही अपनी दुनिया समझ लेते हैं। मगर असल में उस भीड़ के भाव को समझ नहीं पाते। ये समाज यानी भीड़ जो खुद मे तो हमे जोड़ता है लेकिन हमे ख़ुद से अलग कर देता है। जैसे सभी रंग को एक ही जगह मिला दिया जाए, तो सभी रंग अपनी वास्तविकता खोकर एक नए रंग को जन्म देते है। ठीक उसी प्रकार हम बुद्धिजीवि मानव भी इस समाज के दल दल में फसकर, अपना असल अस्तित्व खो बैठते हैं।


एक शब्द होता हैं अजनबी, अज्ञात , हम फिर खुद के चरित्र को कुछ वैसा ही बना देते हैं। यानी हमे क्या करना है? कैसे करना है? क्या परिणाम होगा? ये हम खुद से न सोच के, वो समाज को अपना ज्ञानी समझ बैठते हैं। और बस ये समाज ही हमारा गौरव और चरित्र निर्धारित करता हैं और उसी मे अपनी जगह मान, सम्मान, इज्जत को सर्वोच्च बनाए रखे रहना चाहते हैं।और उसी कोशिश में हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इसी महावीनाशक समाज की गुलामी में लगा देते हैं। ताकि सम्मान बना रहे।



मानव के पास एक सबसे अनोखी शक्ति होती हैं। वो है मानवता।

ये मानवता सभी प्रकार के उच्च कोटि के भाव व एहसासों से मिल कर बना है। जिससे जो किसी को भी, अपना परम बना सकता हैं।

मगर ये नायब तोहफ़ा मानव खोता जा रहा है। आखिर क्यों???




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