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ये लोग भी न जाने क्यूं आते हैं

अविनाश जोशीअविनाश जोशी February 2, 2022
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मंजिलों पर सफ़र के किस्से सुनाते हैं ,
   ये लोग भी न जाने क्यूं आते हैं ,

हर राह पर निशान मिलते हैं उसके ,
   न जाने फिर क्यूं पैर  डगमगाते हैं ,

कुछ यारों के घर बसेरा था हमारा ,
   अब तो हम  भी वक्त पर आते हैं ,

जागती रहती हैं आखें ख़्वाब में ,
  और कोई ख़वाब नही आते हैं ,

थे पहरे ज्यों उसके कूचे में जोशी ,
     वहा भी अब लोग चार नज़र आते हैं

        – अविनाश जोशी

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