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कितना विचित्र होता हैं कवि होना

अविनाश जोशीअविनाश जोशी February 16, 2022
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एक कवि के अन्य काम भी होते हैं ,
सुबह उठ कर न जाने कैसे खयालों में खोए हुए भी बाज़ार जाकर सब्जी खरीदना ,
सब्जी खरीदते वक्त सब्जीवाले को निहारना और उसके अंदाज में कुछ न खुश सी खुशी ढूंढना ,

वही से थोड़ी दूर पर दूध वाले से मिलना ,
और उसके कुर्ते  पर लगे दही के धब्बों को देखना ,
देखते देखते अपने काम की बात भी करना ,
फिर उन्हीं बातों से अपने भीतर के ख्यालों को खोना 
कितना विचित्र होता हैं कवि होना ,

कितना अजीब हो जाता हैं सब काम करते हुए भी उस अधूरे ख़्याल को बरकरार रखना ,
अपने भीतर उपजी कविता को वस्तु के भाव  न बेचना ,
उसके मूल को जीवंत रखना ,
कितना विचित्र होता हैं कवि होना 


मंडी में  दो किलो टमाटर खरीदते हुए ,
उस लड़की के दो गाल की लाली के याद को दबाना ,
और फ़िर उसे याद रखना ठीक वैसे ही जैसे ,
उन टमाटर को देखते हुए उसका मुखरा दिखना ,
कितना विचित्र होता हैं कवि होना ,

हर वक्त खुदको ताने से कसी बातों में पिरोना ,
कही कुछ कहो तो तुम्हारे साहित्य पढ़ने की बातों पर उपहास होना 
यूंही लिखते पढ़ते बीच में मां का फोन कॉल आना ,
कितना मुश्किल होता हैं न उस कॉल पर अपनी व्यथा सुनाना ,
कितना विचित्र होता हैं खुदको कवि कहना ।


                – अविनाश जोशी ।

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