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आँगन


एक घर था,

"एक आंगन"था, 

हम भाई ,

संग रहते थे

एक साथ ,

बातें करते थे

एक लालटेन में,

पढ़ाई करते थे

माँ की रोटीयां 

औऱ थपकियां

संग में होती थी

हजारो खुशियां

लगता था ,

जग बस इतना ही था,

पूर्ण लगता सब,

अभाव कितना भी था,

कई मकान बन गए अब,

पर ना माँ है,ना वो "आंगन"

बस दूर रहकर भी संग रहे हम 

हरदम ,यही है मेरा मन।


अविनाश "अवि"

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