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दास्तां ए मंजिल

Avinash KumarAvinash Kumar October 21, 2021
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एक वादा किया था ,
वापस आऊँगा हर उम्मीदों पर खड़ा उतरूंगा !
जो भी सपनें देखें थे उन्हें अब साकार कर लौटूँगा यह कहा था ।
इसी दिलासे को मन की ढाल बना घर पीछे छोड़ चला था ,
हर बंधन को तोड़ने को मैं अब तैयार था ।
ना परवाह की थी वर्षों के उस स्नेह की ,
ना ही रुका था उन आसुंओ से ही मैं !
हृदय को पाषाण में कर परिवर्तित उठा यादों का बस्ता ये दुनिया जितने मैं निकल पड़ा था ।
अंजान लोगों के बीच अब अपनी एक अलग सी दुनिया बसानी थी ,
इस भीड़ से निकल अपनी पहचान जो बनानी थी । 
मेरी मंजिल के किस्से तो दुनियां भर में मशहूर थे ,
उसके पीछे ना जाने कितने दीवाने पागल थे ।
हम भी सुध बुध खो उस दौड़ में शामिल हो गए ,
बहुत से रास्तों से हम गुज़रे !
छोटे छोटे कदमों से लक्ष्य की तरफ हम चलते चले गए ।
जो कभी गिरे तो हाँथ पकड़ उठाने वाले भी मिले ,
जिस दफे हारे तो ढाढस बंधाने वाले भी मिले !
जब थक कर मैदान छोड़ जाने लगे तब हिम्मत देने वाले भी मिले ।
अथक प्रयासों के बाद भी ना जाने कहाँ रह गई थी कमी लगने लगा था मानो निर्धारित गंतव्य तक पहुंचना  मेरे प्रारब्ध का हिस्सा ही अब ना था ,
उस रास्ते पर दौड़ते दौड़ते अब मायूस मै हो चला था !
जो साथ थे मेरे उन्होंने भी थक कर बैठना ही उचित समझा था  ।
खुद को बना लिया था कठोर अब मैंने इतना कि चोट खा भी मुस्कुरा रहा था मगर अंदर से टूटा जा रहा था ,
उन घावों को अंतर्मन में छिपा रहा था !
डगमगा रहे थे कदम मगर मैं रुक ना पा रहा था ।
 रुक गया जो अगर तो अपना सब कुछ दाँव पर लगा जो बैठे थे उनसे नजरें कैसे मिला पाऊंगा ,
 उनके दुख का भार मैं कैसे सह पाऊंगा !
 इसी असमंजस में फंस मै खुद को ही कहीं खोता जा रहा था ।
 हर उम्मीद जब छोड़ रही थी साथ तब मानो कोई चमत्कार हुआ ,
बंजर हो चुकी धरा पर वर्षों के सूखे के बाद मेघों ने वर्षा के इस आव्हान को स्वीकार किया !
हर्षित हुई प्रकृति और अंधकार के मध्य ही सूर्योदय हुआ ।
सत्य है जब मनुष्य ठान लेता है तब हिमालय भी बौना हो जाता है ,
प्रकाश बिखरने को खुद को अग्नि में तपाना पड़ता है !
मानव के निश्चय के आगे समुद्र भी सूख एक तालाब भर बन रह जाता है ।
इस नए सवेरे की छंटा निराली थी ,
अंततः अब रुक पर पीछे मुड़ने की आज़ादी थी !
जो पलके बिछाएं विश्वास जताए बैठे थे वापस जा अब उनके इंतजार को खत्म करने की बारी थी । 

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