उसका जादू's image
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जो भी लिख गया सो लिख गया, फैज

अब न किरदार न लिखने वाला

एक घर जिसे उम्र भर बनाया मैंने

उसी की कीमत लगी है आज वही बिकने वाला


आखिरी बार उस चौखट पे सर रखकर रोया ऐसे

जैसे अपने गले से लिपटा हो अपना साया


रंग हरा हो.... लाल हो या कोई और

मुझे तो एक उसका रंग ही भाया


सोचता हूँ कितना फनकार है खुदा मेरा

एक इंसानी सूरत में जादूगर बनाया

मैंने जब भी उसका नाम अपनी कलम से लिखा

गजल भी तन्हा रही खुद को भी तन्हा पाया


मुझको मालूम है उन आंखों में रहने की सजा

मैंने हर ख्वाब को उसके लिए बंदी बनाया



झूठ बोल के जी रहा था घुट के मगर

जब से सच बोला है सच में मुझे चैन आया


सहर में कितने दिन से रह रहा हूँ फिर भी मगर

खुदा ने अपनी मौजूदगी से अब मिलाया



उसका जलवा उसका जादू उसकी काबिलियत पे

फैज मरमिटता है उस शख्स की मासूमियत पे


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