क़लम's image
हर रोज़ जब वो अपनी मांग भरती होगी,
दर्पण में देखकर ख़ुद को, मुझे याद करती होगी,
इक गुज़रा जमाना था जो बीता और अब वो आज है,
मिलानी ही पड़ेंगी नज़रें किसी-न-किसी ग़ैर से,
लाज़ के मारे, घूँघट के सहारे, वो चेहरा ढँक लेती होगी।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts