दुखी सुखन्वर's image
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एक बार आसमान छूने की बात करी थी मैने रास्ते में

उस दिन ज़मी रास्ते भर रोई थी मुझे घर पहुंचाते पहुंचाते


कोई फूल नहीं खिलता अब मेरे आंगन में

आखिर कौन मुर्जाना चाहेगा मेरी उदासी देखते देखते


मुझसे पूछा किसी ने कि कैसा लग रहा है आकर शहर में

अगर अच्छा बता देता तो एक उम्र लग जाती अपने गांव को मनाते मनाते


अब तो लोग ठीक से वफादारी तक नहीं निभाते दुश्मनी में

और एक हम थे जो कभी थके नहीं दोस्तो को शराब पिलाते पिलाते


अपनी जीत का पक्का यकीन था उसको चुनावी मैदान में

जरूर उसकी नजर मजहब पर पड़ी होगी सियासत बांटते बांटते


खुदा कोई बेटी न दे उन परिवारों में

जिनके मर्द थकते नहीं है पराई औरतों का जिस्म देखते देखते


मत पूछ उनसे कि क्या क्या शौक थे उन्हे जवानी में

वो बेचारे बूढ़े हो गए तुझ को जवान करते करते


ये कलम हमे कोई काम न आई नई मुहब्बत में

बिक चुका है इसका इमान उसी पुराने शख्स पर गज़ले लिखते लिखते


बैठना वो भी चाहते है अमीरों की महफ़िल में

जिनका बचपन गुजरा अमीरों का गरीबों पर जुल्म देखते देखते


मै तब्दीली लाना चाहता हूं लोगो की सोच में

जरूर मेरी ये बाकी बची जिंदगी गुजरने वाली है पछताते पछताते


और उम्र भर के लिए अंजान बनकर रहना चाहता था इस दुनिया में

मगर मैं करता रहा अपने ही हाथो से खुद को मशहूर करने का गुनाह यूंही लिखते लिखते।

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