अल्फाज़ मेरे जज़्बात के's image
Love PoetryPoetry2 min read

अल्फाज़ मेरे जज़्बात के

ashyshayar1441ashyshayar1441 June 5, 2022
Share0 Bookmarks 24 Reads1 Likes


शौक तो होते ही है जवानी में मुहब्बत के

जिंदगी पहले से इंजताम करके जो रखती है बगावत के


ये जिस्म कुछ भी तो नहीं,लोग यूंही पीछे पड़े रहे इस बनावट के

वो लोग ही कुछ और होते है जो दीवाने होते है शराफत के


क्यूं करते जा रहे हो अपने दिल से ये गुनाह मुहब्बत के

लाले पड़ जाएंगे तुझे अपनी ही ज़मानत के


सब को मैं खुशमिजाज लगता हूं बस वही एक नज़र पहचानती है मेरी उदासी को

नखरे ये दिन म दिन कितने बढ़ रहे है मेरी तबियत के


और लोग मारने लगे है अपनी ही बस्ती के आदमी को

ये घर नजाने कैसे इतने करीब जा पहुंचे सियासत के


लोगो को रोते हुए देख थोड़ी देर अच्छा लगता है मुझे क्यूंकि मैं भुला नहीं हूं अपने वो दिन जूठी मुस्कुराहट के


आदमी की हवस ने कैसे कैसे मंज़र दिखलाए

वो दरिंदे सीने पे बम रखकर फट गए हूरो की चाहत के


कैसे वो लोग होंगे जो मर गए सच के लिए

जरूर वो सबसे पसंदीदा शिकार रहे होंगे जमाने की नियत के


और मेरी तरह गुजार कर तो देख कुछ साल कलम के साथ

आने वाले कही ज़माने मुरिद रहेंगे "सौरभ"तेरी इस लिखावट के।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts