पंचवटी's image
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इस पंचवटी पुनीत में,
गोदावरी के गीत में।
काठ की उस नाव में ,
पर्ण कुटी की छांव में।
हर कण यहां पर प्रीत है,
हर क्षण यहां पर प्रीत है।

श्री राम के कर्तव्य में,
वचन के उस मान में।
भाई को जो थी समर्पित,
लखन के उस प्राण में।
उल्लेख में भी प्रेम है।
आलेख में भी प्रेम है।

मां जानकी के स्वयं ही,
हर विभव को तजने में।
मिथिला, अयोध्या छोड़कर,
वनवास को अरजने में।
हर कर्म में ही स्नेह है।
हर मर्म में ही स्नेह है।

लखन संग जागी हुई,
चाहे वो रमणीक रैन हो।
कनक मृगा पर नजरें टिकाए,
श्री राम के दो नैन हो।
हर अंश में अनुराग है।
रघुवंश का अनुराग है।

चहुं ओर कुटी घेरे हुए,
लक्ष्मण का वो लकीर हो।
मोक्ष की अभिलाषा ले,
पहुंचा प्रपंची फकीर हो।
इस फिक्र में भी भाव है।
इस जिक्र में भी भाव है।

मायापती को फांसती,
माया का वो संयोग हो।
प्रियतमा की शोक में,
राघव का वो वियोग हो।
विलाप में यहां प्यार है।
हर छाप में यहां प्यार है।

                    ~आशुतोष मिश्र
     (æ poetic soul)
                                    

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