सत्य प्रेम's image
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हमने देखा है लोगो को,
प्यार, प्रतिको मे ढूंढते हुए, 
कभी ताजमहल, कभी चित्तौड़,
कभी गहलौर के माँझी बनते हुए, 

प्रतिको मे ढुंढोगे इसको तो,
फिर अंदर इसे ना पाओगे, 
बस शिश नवा बाहर से ही,
मझधार मे रह जाओगे।

मै देख रहा ये रीत नई,
बाहर से रंगे ईश रंग,
अंदर मे सब मलीन बड़ी,
मंदिर मस्जिद सब भंग भंग,

भीतर मे सभी जो देव बसे,
बाहर हो व्यर्थ क्यो खोजते,
एकाग्र मन, फिर स्वचिन्तन, 
भीतर के महल प्रवेश करे,

सब सुख भीतर ही पाओगे,
तो फिर धैर्य साहसी वीर बने,
ईश्वर मे बस अब रम जाए,
चाहे राम या रहीम बने,
नफरत की आग से बचकर के,
खुद ही अपना भगवान गढ़े,

और उनको भीतर मे रखे,
पुजा जिनकी हो अहम त्याग,
काम क्रोध लोभ मोह का सर्वनाश, 
संयम से यह हासिल होगा,
संकल्प सत्य हो और कर्म सत्य, 
फिर विजय पथ प्रशस्त होगा।

आशुतोष गौतम 

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