फ़रार ख़्वाब's image
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मेरे तकिये से दबे, 

मेरे सिरहाने से

कल ही से कुछ 

ख़्वाब ग़ायब हैं

मेरे ज़ेहन के 

क़ैद से भाग के

न जाने किस गली

किस शहर,

किस मोहल्ले 

वो घूमते होंगे।

_अशरफ फ़ानी

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