फर्क समझाते है's image
OtherPoetry2 min read

फर्क समझाते है

Meenal PapnoiMeenal Papnoi December 22, 2021
Share0 Bookmarks 16 Reads0 Likes
आज खुला किताब का वो पन्ना जो बंद हमेशा के लिए किया था
कहानी उसकी भी थी ऐसी कोई जिसे भूलने का नाटक उसने किया था

तो आओ उस कहानी की एक झलक सुनाते है
लोगो को मज़ाक करने और उड़ाने में चलो फर्क समझाते है

आसान नहीं है उसे फिरसे दोहराना
उस दौर का उसका उभर पाना
अलग थी वो लोगो की सोच से

सबके तानो का जो उसपर पहरा था
दूर थी वो सबसे

हां, रंग जो उसका गहरा था
आंखो में भरकर ख्वाब कुछ उसने भी उड़ने की ठानी थी

रंग बदल लो कहकर कितनो ने रोका उसे पर वो कहां रुकती वो भी तो बहता पानी थी

यह रंग लाई कहा से हो?
ऐसे बातो से पाला तो पड़ता उसका रोज़ है

यह रंग बदला जा सकता हैं क्या?
जनाब मेरे रंग से गहरी तो आपकी सोच है

अभी भी वक्त है हल्दी बेसन लगा लो
फिर किसीने कहा बेहतर रहेगा अपना चेहरा ही छुपा लो

किसी की नज़र में वजन ज़्यादा तो कभी कम था
सबको नफरत उससे थी या कहलो कारण उसका गहरा रंग था

वो उभरी हैं उस दौर से जो नही उभरे, आओ उन्हें सिखाते है
तो लोगो को मज़ाक करने और उड़ाने में चलो फर्क समझाते है

नाम अलग काम अलग फिरभी एक तो कहलाते है
पूछे जाने पर पहचान को हम एकता तो बताते है

फिर यह रंग रूप के आजाने पर हम क्यों फर्क करजाते है?
क्यों फर्क करजाते है?!

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts