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हाँ हूँ ग़रीब

Ashish PandeyAshish Pandey September 19, 2021
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कर श्रम अपार, दे लहू स्वेद, जीवन आसान किया मैंने,

पर बदले में, सुन ओ कृतघ्न, क्या यह सम्मान दिया तुमने ।

क्यूँ मेरे बच्चों की पीड़ा, का तुमको कोई भान नहीं,

क्या मानवता की मर्यादा, रखना भी अब आसान नहीं?

जीवन सुधरे इस चाहत में, मैं छोड़ गाँव आया बस्ती,

कब सोचा था बहुलमूल्य वस्तु सबसे इतनी होगी सस्ती।

सोचा वह जग प्यारा होगा, जीवन का मोल बहुत होगा,

खंडित हो गया स्वप्न मेरा, बच्चों को अकुलाते देखा ।

दो रोटी भी जो देते हो, करते भर भर गुणगान यहाँ,

क्या लेकर आए थे जन्मोसंग, तुम गेहूँ और धान यहाँ?

किंचित अब यह स्पष्ट हुआ, दो रोटी अब भी है दुर्लभ,

हैं माह-वर्ष बीते जाते, जाने कब आए सुख सौरभ।

माँ के शव के सट बैठ बाल अकुलाता है माँ बोल उठे,

क्या दया नहीं तुझ इतनी भी, ले गोद उसे तू आँचल दे |

सब छोड़ आज हूँ लौट रहा, कुछ स्वर्ण नहीं सब काँसा है

जो पहुँच गया सकुशल तो भी समझूँगा कुछ तो आशा है,

यह अंत नहीं है जीवन का, फिर चाहोगे तुम मेरा साथ,

देखूँगा मैं भी किस मुख से, आते हो करने सिद्ध स्वार्थ।

माँगा बस न्यून चाहिए जो, फिर भी हरदम हूँ गया छला,

हाँ हूँ ग़रीब मैं लेकिन इसमें मेरा क्या है दोष भला ?

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