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मूर्ख

मैं मूरख और दुराचारी क्या समझूं रिश्तो का मोल
विचलित और विकृत में मुख से कैसे बोलूं मीठे बोल

क्यों परिभाषा प्रेम की मुझको समझ ना आई 
जब करनी थी दीनता तब मैंने की चतुराई

अंधकार का छोर पकड़ मैं ढूंढ रहा प्रकाश
जिसने दिया प्रेम भाव उसको ही किया निराश

कैसा सौदागर हूं मैं घाटे का सौदा कर बैठा
प्यार मिला था मुफ्त में मैं इनकार कर बैठा

हर रिश्ते को नापा तोला लेकर एक तराजू 
अब सूनी आहै भरते हैं मेरे यह दोनों बाजू

सोच रहा हूं बैठा बैठा कैसे करूं मुनाफा
कैसे खोलूं बंद पड़ा रिश्तो का एक लिफाफा

एक उपाय मन में मेरे आया है इस बार
भोला अतीत प्रेम से तोड़ू नफरत का व्यापार

कवि: आशीष तिवारी

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