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कुछ से सबकुछ

Ashish KhuranaAshish Khurana June 16, 2020
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ये कौन है जो मेरी आँखों के पीछे से झांकता है

कया ये मैं हूँ या वो जो सबकुछ है


ये हाड़ मांस का शरीर, ये विचारों के बादलों से भरा मन का आकाश

क्या ईससे भी अलग मैं कुछ हूँ


कौन है कैसा है ईश्वर

वो सबकुछ है या मैं ही सबकुछ हूँ


गहराइयों में ऊतरूं या ऊंचाइयों को छूने का साहस करूँ

ईस धरती के तले भी वही सबकुछ है

ईस गगन के परे भी वही सबकुछ है


घने अंधकार को चीर कर जिस रोशनी का सृजन हुआ

वही तो सबकुछ है

और मैं तो कुछ भी नहीं


अंधकार से निकली ईक रोशनी की किरण हूँ मैं

फिर ऊसी अंधकार में विलीन हो जाऊँगा

ऊस पल में मैं फिर कुछ से सबकुछ हो जाऊंगा

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