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खुदको क्यों ढूंढता रह जाता हुँ

असीम पंड्याअसीम पंड्या May 7, 2022
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क्या हुँ इतना महान , 
या खुदको समझ जाता हुँ,
खुदको क्यों ढूंढता रह जाता हुँ ।
कहीं खोया हुँ, 
या कर रहा कोई ढोंग खुदसे,
मंज़िल को तलाशने क्यों भाग जाता हुँ ।
चाहे जल प्रपात हो या हो शांत सा मकबरा कोई,
चिड़ियों की चहचहाहट हो या संगमरमर की मूरत,
वादियों की खूबसूरती देख शहूर क्यों हो जाता हुँ।
क्या हुन इतना महान , 
या खुदको समझ जाता हुन,
खुदको क्यों ढूंढता रह जाता हुन ।

-असीम

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