yeh pal yu hi beet jaata hai's image
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जो कुछ सोचा था

वह रेत हो जाता ह,

शाम को सोचा ख्याल

रात को सताता है,

यह पल यु ही बीत जाता है,

 

बचपन मैं सुनने गाने

जवानी मैं क्यों समझ आते है

किताबो से ज्यादा

इन् किताबो की खुशबू क्यों सुहाती है

न जाने क्यों अब, बच्चो की किलकिलारी भी रुलाती है

इन अकेली रातों मैं यह दिल क्यों सहम जाता ह

हाय, यह पल क्यों नहीं बीत जाता है

 

आँखों मैं सजाये सपने सहसा भीग जाते है

हर दिन हिम्मत कर इन्हे, सुखाया जाता है

न जाने वह पल क्यों नहीं बीत जाता है

 

जो बचपन बड़े होने का सोच के हँसा करता था

वह बड़ा, आज क्यों नहीं मुश्करता है,

दोस्तों के साथ जीने वाले

आज दोस्तों से भागा करते है

प्यार सीखने वाले सयाने लोग

खुद गालियों का जाप करते है

ऐसे ही, यह पल यु ही बीत जाया करते है

 

इन खाली चार दीवारों मैं

क्यों नहीं गूंजती मेरी हसी

इस प्रश्न का जवाब क्यों नहीं विज्ञान बनाता है

क्या विज्ञान को भी अस्वीकारता का डर सताता है

इन सवालों मैं खोकर, कभी कभी

यह पल यु ही बीत जाता है

 

खाली बैठना नहीं सुहाता है

पर क्या करू, यह भी समझ नहीं आता है

वजह का बेवजह होना

ऐसा क्यों भला हो जाता है ?

इन बदलते समय को समझने मैं

सारा समय भीत जाता है

यह पल यु ही बात जाता है

 

लोगो की उम्मीद पर खड़ा होना क्यों पैर जलाता है

इन घावों पर क्या मलहम लगाऊ यह भी नहीं समझ आता है

लाखों सवालो का एक ही जवाब बता दिया जाता है

दुखी होने का भी वक़्त तय लिया जाता है 

आंखें तरस ति थी जिस जवान आज़ादी के लिए

वह आज आँखों मैं चुबती है

इस चुंबन को मिटने का तरीका भी नहीं आता है

क्या करे, धीरे धीरे,

यह पल यु ही बीत जाता है

 

किसी रोज़ किसी ने कहा है

जो गिरा है वही उठ पाया है

पर जो न उठ पाए उसका किस्सा, किसी ने नहीं सुनाया है

अब उठने मैं भी यह पैर काँप से जाते है

दुनिया ने मुँह फेरा है हमसे, अब कम्भख्त खुद का अक्स भी नज़रे चुराता है

इन खयालो मैं घूम, मेरा यर्ह पल यु ही बीत जाता है   








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