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 जाते-जाते जब मुड़ कर देखता हूँ
मैं राह पर अपने ही निशां ढूंढता हूँ
निशां ये सारे मिट जाएंगे
वक़्त की लहरों में धूल हो जाएंगे
अक्सर अकेले में यही सोचता हूँ
फिर नज़रों को उठा कर 
जब किसी को ढूंढता हूँ
तुम्हें इन्हीं रास्तों पर देखता हूँ
मिट जाएंगे सारे निशां मेरे जाते ही भले
पर तुम में मैं कहीं खुद को देखता हूँ
जिस राह भी तुम चलो कल जो कुछ भी बनो
हर जीत तुम्हारी नई ऊंचाई होगी
पर हर हार तुम को जो मिले वो मेरी हार होगी
एक उंगली जो तुम पर उठेगी वो मेरी ओर होगी
कल तुम जहां भी रहो मैं याद तुमको रहूँ 
या मुझ को भुला देना
कल जो भी तुम बनो ये बात याद रखना
कुछ भी बनने से पहले तुम इंसान बनना।

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