कुछ बातें , कुछ लोग ....! ~ अनुराग अंकुर's image
Why do I writeArticle4 min read

कुछ बातें , कुछ लोग ....! ~ अनुराग अंकुर

Anurag AnkurAnurag Ankur February 4, 2022
Share0 Bookmarks 44 Reads1 Likes


कुछ

बातें,

कुछ

लोग,

ऐसे जरूरी होने से लगते हैं जैसे उनका होना ही हमारा होना है , उनका उपस्थित होना ही हमारे अस्तित्व का प्रमाण सा बन जाता है। कई बार मन जीवन के इस घुमावदार मोड़ से गुजरता है तो मानो जी चाहता है की किसी खुले आसमां के नीचे बैठ कर हर किसी प्राकृतिक संरचना से पूछा जाए की क्या तुममें भी यह अंतर्नाद गूंजता है,तुम भी किसी की उपस्थिति को ही अपना अस्तित्व मानते हो ?


कई मर्तबा जब किसी चले जाने वाले की यादों की एक लंबी फेहरिस्त आपके चारो ओर बिखर कर, आपसे उलटे ही सवाल करती है तो आप एक अटपटी सी मूक विवशता में शून्य की तलाश करते हैं।कई दफा ऐसा लगता है की कोई रंजिश है इसके पीछे, जो मुझे बार - बार अपराधबोध कराना चाहती है।


उफ्फ ! कितना हैरत अंगेज है ना सब कुछ.....

अचानक ही किसी गौरेया से वास्ता हो गया था। पूरी शिथिल... मुरझाई सी।मानो जैसे किसी मनहूस ने आपको तड़के भोर में ही डांट की घुट्टी पिलाई हो,जैसे किसी गहरी पाप की खाई खोदते - खोदते किसी रावण ने प्राण त्यागे हों या फिर किसी ने चमचमाते सूरज के मुंह पर काले बादलों का जत्था फेंक कर मारा हो।काफी देर तक पंखों में रवीश कुमार जैसे प्राइम टाइम करने के बाद अब वह कुछ उछली फिर पुनः बैठ गई। मानो अब वह मुझसे ही सवाल दागना चाहती हो।क्या ? पता नहीं।


अचानक ही उमड़ पड़ते हैं बादल,वातावरण कोलाहल होकर कंपित होने लगता है। लोगबाग समेटने लगते हैं खुद को।देखते ही देखते एक लंबी चौड़ी भीड़ गुब्बारे जैसे सिमट कर दुकानों में रखे मैगी के बिखरे पैकेट जैसे ठूंस जाते हैं। मैं छत की बालकनी से ये दृश्य देख रहा था, जहां हर तरफ भय से हर कोई खुद को समेट रहा था।


ये सब एक रेल की भांति मुझमें दौड़ रहा था की गौरैया उड़ चली,जहां हर कोई खुद को समेट रहा था वहां वह पंखों को फैलाए मानो अकेले ललकार रही हो।मैंने सोचा कि उसे रोका जाए की इस समेटने के माहौल में फैलना अच्छा नहीं है।पर उन पंखों के विस्तारण में आशा थी,ललक थी,चाहत थी... सिकंदर वाली। अब वह उन चाहतों से फूलों को चूमेगी,धरती पर गिरती एकाध बूंदों को वह रोक लगी,या यूं कहिए की सिमटते माहौल को समेट लेगी।मानो वह मुझसे ये बतलाना चाहती हो की तुममें संकुचित होकर चुभ रही निराशाएं भी किसी विस्तार से फूट सकती हैं। तुम्हें अब विस्तार लेना चाहिए।


मैंने नजरें नीची की,सिरहाने को दीवार से सटा कर फिर उसकी तरफ देखा। वह नहीं थी। मन में संतोष का बांध टूट गया , बैचैनियों का सागर उमड़ पड़ा।बरसते माहौल में सरपट दौड़ा।कही कुछ नहीं,वह चली गई,बस यादें मुझमें लौट रहीं थी पर इस बार विस्तार से खिखिलती आशाएं थी,सिमटता हुआ अपराधबोध नहीं। अंततः भींगते बालों से होठों पर गिरते बूंदों को समेटते हुए मैं अचानक अज्ञेय को बुदबुदा उठा -

"मिट्टी निश्चित है यथार्थ पर,

क्या जीवन केवल मिट्टी है?"


~ अनुराग अंकुर

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts