कविता - संकेत : अमानवीय सत्ता का's image
Peace PoetryPoetry2 min read

कविता - संकेत : अमानवीय सत्ता का

Anurag AnkurAnurag Ankur February 28, 2022
Share1 Bookmarks 175 Reads1 Likes


एक नोटबुक

जिस पर दर्ज़ रहे होंगे

गणित के दर्जनों सवाल,

जिन्हें सुलझाना बाकी था।

या फिर दर्ज़ रही होगी

कोई अधूरी कविता,

जिसका कवि अब एक

कल्पना बन चुका होगा।


वह नोटबुक जिस पर

3 परतों जितनी,

मोटी जिल्द चढ़ी होगी

एक नर्म बस्ते में रखने के लिए।

अब वह कंकड़ों में

सिसकियां ले रही है।


वह फल जिसे काटकर

खाया जाना था,

फटा हुआ

जमीन पर पड़ा हुआ था।

वह प्रतीक था,

मनुष्य की फटी हुई मानवता का।


वहां सब कुछ भरा हुआ था

ऐसी चीजों से,

जो कुछ नहीं बोलती

जो कुछ नहीं सोचती।

दूसरी कक्षा में पढ़ा था,

कुछ नहीं बोलने

कुछ नहीं सोचने

वाली चीजें अमानवीय होती हैं।

जैसे

वह नोटबुक,

वह टैडी

बहुत सारे कंकड़

और वह दो लाशें

जो कुछ नहीं बोलती,

जो कुछ नहीं सोचती।


एक टैडी,

एक नोटबुक,

और बहुत सारे कंकड़

का बचे रहना

सिर्फ अमानवीय चीजों का

बचे रहना ही नहीं है।

वह संकेत है,

आने वाली

अमानवीय सत्ता का।


~ अनुराग अंकुर


( नोट -: यूक्रेन की राजधानी कीव में हुए रूसी हमले पर रचित )


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts