'हिन्दी ही क्यों?' - पढ़िये हिन्दी दिवस पर अनुराग अंकुर का विशेष लेख।'s image
Hindi DiwasArticle3 min read

'हिन्दी ही क्यों?' - पढ़िये हिन्दी दिवस पर अनुराग अंकुर का विशेष लेख।

Anurag AnkurAnurag Ankur September 16, 2021
Share1 Bookmarks 133 Reads1 Likes

अंग्रेजी माध्यम का छात्र होने के कारण मेरे साहित्यिक कार्यों को देखने के बाद मेरे कई बार मित्र पूछते हैं - 'हिन्दी ही क्यों?'


तो हिंदी इसलिए नहीं कि यह मेरी विरासत या सांस्कृतिक भाषा है, बल्कि हिंदी इसलिए की बाल्यावस्था में जो क्रीड़ा के बाद उत्पन्न पीड़ा और थकान से ग्रस्त, धूल - धूसरित, शरीर के हर उस चक्षु को भी बगैर किसी औषधि या चिकित्सकीय निरीक्षण के बंद करने में समर्थ मातृप्रेम का और कुछ यों कह सकते हैं कि जीवन का पहला राग, वह वात्सल्य गीत (लोरी) मैंने हिंदी में ही सुना।


गौरतलब है कि जीवन का प्रारब्ध जिस किसी भी सकारात्मक पड़ाव से हुआ हो उससे मुंह मोड़ना स्वयं के प्रति, लोक के प्रति तथा इस संपूर्ण सृष्टि का नियामन करने वाले उस परमपिता परमेश्वर के प्रति एक जघन्य अपराध ही नहीं मानवता के प्रति भी कृतघ्नता होगी। ठीक उसी प्रकार मुझ मानव के चित्त में उत्तम चेतना और उत्तम चरित्र के दीपक को प्रज्वलित कर उसका प्रारब्ध करने वाले हिंदी से मुंह मोड़ना मेरे लिए निजी रूप से अपराध होगा


हिंदी वह विशाल महानदी है जिसके दोनों पाटों के मध्य मेरी चेतनाएं हिलोरें मारती हैं, जिसके धार की गति से मेरा जीवन निरंतर गंतव्य की ओर बह रहा है, जिसकी कलनाद के ध्वनि से मेरा राग प्रस्फुटित हो रहा है, जिसके किसी झरनें पर मिलकर गिरते वक्त मैं निर्झर नेत्रों से विलाप करता हूं तथा प्रहर चार रस सने बाद जब शीतल चांद की चांदनी संपूर्ण तट शांति से सराबोर हो जाता है तब मैं ऊर्जावान होकर उत्साहित महसूस करता हूं।

अंततः सार संक्षेप में कहू़ं तो इस नदी के मध्य ही मेरे समग्र जीवन का स्नान, ध्यान, भोजन - भजन इत्यादि मानवीय क्रियाएं संपन्न हो रही हैं। इस प्रकार का वात्सल्य भाव प्रदान करने वाली मां हिंदी का ऋण दिग् - दिगांतर तक मुझ पर स्थिर रहेगा।

 बस यही उपरोक्त कारण है कि -

'हिंदी मेरे लिए भाषा नहीं आशा है'। तुझको आकाश भर प्यार और प्रणाम मेरी नदिया।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts