शामें।'s image
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वो गर्मी कुई छुट्टियों में कमरे की खिड़की पे लटके रहना,
और धूप से जाने की गुहार लगाना,
शाम का इंतजार करना, और उसके आते ही निकल पड़ना, गेंद और बल्ला लिए। 

वो शामें ही थीं, जो आपको एक मौका देती थी अपना बुरा बीता हुआ दिन वापस जीत लेने को। 

वो अनगिनत किस्से, लगातार बदलती तस्वीरें,
वो रोज़मर्रा की चुगलियां, सुबह से शाम तक का निचोड़,
इन सब में जो एक बात वहीं रही वो शाम थी। 

कभी यूँ ही टहलते हुए आने वाले दिनों की तैयारी, कभी बीते हुए इम्तेहान के पर्चे लिए माथा पकड़े इधर उधर घूमना,
और सोचना की ये शाम यहीं रहे और अंधेरे की गुमनामी टलती रहे। 

आज अक्सर हर शाम को सफर में होते हैं, अपने दफ्तरों से खुद को बटोर के रात के हवाले कर देते हैं। 

शाम आपको अंधेरे की ओर चलते देखती है, पर कुछ कहती नही। 
अब समझ चुकी है कि गेंद और बल्ला अब नही है,
और न धूप से वापस लौट जाने की गुहारें। 

अब शाम तन्हा है, गुमशुदा है। 

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