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Romantic PoetryStory3 min read

मैं कुछ अपनी याद लिख रहा हूँ मैं तुम्हें लिख रहा हूँ - आखिरी खत

Anuj YadavAnuj Yadav December 11, 2021
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 खत 


             इस व्हाट्सएप , मैसेज और कॉल के बाद भी मैं खत लिखना चाहूँगा | मैंने आज तक किसी को खत नहीं लिखा | कभी जरूरत ही नहीं पड़ी |

मुझे पता है कि ये खत तुम्हारे हाथ नहीं लगेंगे,  लेकिन मैं फिर भी लिखूँगा |

ख़त लिखने की ये मेरी आखिरी कोशिश है |

मेरी गजलें और कविताएं भी रो पड़ते हैं हमारे साथ, फूल और कांटे बन जाते हैं |


फिर भी मैं यह खत तुम्हारे लिए लिख रहा हूं |


ज़िन्दगी के इस उतार -चढ़ाव को देर से समझना  लाज़मी ही था।  पर अब  खुश हूँ मै कि एक आख़िरी खत लिख रही हूँ मैं…..



तुम्हारी वो अस्सी घाट रामनगर का किला।  



तुम्हारी  वो सुबह -ए बनारस की  महफिलें।   




मैं कुछ अपनी याद लिख रहा हूँ.. मैं तुम्हें लिख रहा हूँ...



याद है मन्दिर की सीढियाँ चढ़ते हुए कैसे तुमने मेरा हाथ पकड़ लिया था….कहीं हम लोग बिछड़ ना जावे...

मुझे जब वो दिन याद आते है प्रिय कवि केदार नाथ सिंह याद आते हैं …उनकी वो पंक्तियाँ।

“उसका हाथ मैंने अपने हाथ में लेकर जाना कि दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए….”


वो तो बाते याद होंगीं ही मंदिरवाली... किस तरह पंडित जी पैर छुते वक़्त पंडित जी जोड़ी सलामत रहने की आशीर्वाद दिए थे | ये बातें मुझसे कहकर तुम कैसे खिलखिलाती हुई नजर आ रहीं थी जैसे मानो...उदास मौसम के खिलाफ़ साज़िश... मै भी तो कितना खुश था... सब तो तुम्हारी खुशी के लिए ही तो था | तुम्हारी खुशी देख कर... ऐसा लग रहा था सुकून भरा बस्ता मेरे पीढ पर लादा गया हो...

'यहीं कहीं तो छूट गयी थी ज़िंदगी..

और आज कोई पूछता ही नहीं...

उस वक़्त रोका क्यों नही...मैंने तो मुड़कर भी देखा था...


काश तुम रोक लि होती ...??


कि आ जाओ किसी रोज़ मेरे शहर में और डाल दो मुझे उल्फत में , तोड़  तो हमारी भरम की मैं ये मान बैठा हूँ तुम कभी नहीं आने वाली |

तुम्हारे हाथों से बंधे उस मंदिरों में धागे कि कसम,

ये खत पढने के बाद एहसान के रूप में मत आना,  अपनी मन और दिल का सुनना | जो सही लगे उसे सही कहना... जो गलत लगे उसे गलत कहने से नहीं डरना |


तुम जिस तरह मुझे स्वीकार करोगी

मैं तैयार हूँ मुझे कोइ मानक मत देना

मुझे बीते यादो के हवाले ना करना/देना

बस तुम मेरा साथ देना |

बस आज ये लिखते वक़्त उदास हूँ ... लेकिन तुम पढते वक़्त उदास ना होना...


तुम तो बस हसते हुए अच्छी लगती हो... हंसती रहना... रविदास गेट से रामनगर की तरह |


ये जानना की तुम मेरी बनारस हो...

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