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...मैं हूँ।

AnkitAnkit January 16, 2022
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जो अनंत हो कर भी शून्य दिखे वो मैं हूँ।

जो क्षीर हो कर भी बूँद दिखे वो मैं हूँ।

जो पर्वत हो कर भी ज़र्रा दिखे वो मैं हूँ।

जो दरख्त हो कर भी पत्ता दिखे वो मैं हूँ।


हर साँस मैं हूँ एहसास मैं हूँ,

पाताल मैं हूँ आकाश मै हूँ।

जड़ शरीर को श्वांस बख्शे,

वो हवा की आस मैं हूँ।।


प्रेम मैं हूँ गीत मैं हूँ,

रागों में समाया संगीत मैं हूँ।

सृष्टि संचालन के लिये,

कर्म की परिणीत मैं हूँ।।


भाव मैं हूँ कृत्य मैं हूँ,

तांडव और नृत्य मै हूँ।

आदि से चलती हुई,

भ्रांति मैं हूँ दृश्य मैं हूँ।।


स्वप्न मैं हूँ साकार मै हूँ,

निराकार आकार मैं हूँ।

समाधि में डूबा हुआ,

क्षमा और प्रतिकार मैं हूँ।।


पुष्प मैं हूँ शूल मैं हूँ,

चट्टान मैं हूँ धूल मैं हूँ।

चर अचर जग में समाया,

ज्ञान मैं हूँ भूल मैं हूँ।।


दृष्टि मैं हूँ चक्षु मैं हूँ,

हास्य मैं और अश्रु मैं हूँ।

कर्म बन्धन तोड़ दे जो,

वो मृत्यू मै हूँ मोक्ष मैं हूँ।।


काल मैं हूँ अकाल मैं हूँ,

सृष्टि का दृग्पाल मैं हूँ।

समय चक्र को मोड़ दे जो,

वो अनंत महाकाल मै हूँ।।


- अंकित कुशवाहा

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