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देखा है तुमने कभी
हवा का तड़पकर
हद से गुज़र जाना?
अपनी ही उड़ानों में
थककर चूर हो जाना?
दरख़्तों का घबराई 
हवा को गले लगाना?
उदास चाँद का शाख़ों
पर उतर आना और
चाँदनी की कलई का 
पत्तों पर तैर जाना?
फिर...
सबका मिलकर
सुबह का इंतजार करना 
देखा है तुमने?

मैंने देखा है!

अनिता सिंह सभरवाल

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