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राजनीती के रंग।

Anil jaswalAnil jaswal September 28, 2021
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आज सुबह,

अचानक डोर वैल बजा,

घड़ी में देखा समय,

तो छः थे बज रहे,

मन में बहुत गुस्सा आया,

खुब कोसा,

फिर उठा,

और दरवाजा खोला।


मैं ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌देखकर हैरान,

एक सफेद पोशा धारी,

थे विराजमान,

साथ में थे,

एक मुहल्ले के चौधरी,

बोले नमस्ते जसवाल साहब,

ये हैं बहुत ही गतिशील कर्मठ,

युवा नेता,

बोलते आपसे है मिलना,

हालचाल है पुछना।


मैं ठहरा सीधा-सीधा व्यक्ति,

तुरंत बोल दिया,

आगे तो कभी मिले नहीं,

लगता है चुनाव आ गया भई।


नेता जी ने तुरंत हाथ आगे बढाया,

मैंने भी कसके,

अपना हाथ उनके हाथ में दे पकड़ाया,

बोले ठीक हो,

कोई दिक्कत तो नहीं,

पानी और बिजली ठीक आ रहा,

नहीं तो अभी करा देता,

जेई का तबादला,

मुझे थोड़ा संकोच हुआ,

फिर उस मुलाजिम पे आया रहम,

मैंने बोला,

सब ठीक है नेता जी,

इंडिया है,

थोड़ी बहुत तो कमी रहेगी।


फिर मैंने सोचा,

नेता जी,

इसके बाद कहां है टकरने वाले,

लगे हाथ,

अपनी भी एक दो डिमांड फरमा दें।


मैं बोला,

जनाब गली टूटी फूटी है,

एंट्रेंस पे थोड़ी दिक्कत है,

अगर आपकी कृपा हो जाए,

तो इसका पुनरुद्धार हो जाए।


नेता जी ने,

आव देखा न ताव,

तुरंत मोबाइल निकाला,

और किसी अधिकारी को काल लगाया,

बोले कैसे आदमी हो तुम,

हमारे मुहल्ले में गली खराब है,

और तुम कहते हो,

सब लाजबाव है।


अधिकारी घबराया,

तुरंत बोला,

नेता जी,

बस एक वहीं छोर खराब है,

बाकि हर तरफ कमाल ही कमाल है।

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