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छोटी सी बात

Ananya MishraAnanya Mishra March 6, 2022
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बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं, किन्तु कभी-कभी ये बातें किसी के लिए बहुत बड़ी भी हो सकती हैं, उनके चेहरे पर मुस्कान ला सकती हैं और उनका दिन बना सकती हैं।


इनसे मिलिए। ये हैं राहुल। मुंबई में टैक्सी ड्राईवर हैं। अल्ल-सुबह की फ्लाइट होने से न सुबह की चाय/कॉफ़ी हो पाई थी न नाश्ता, किन्तु माँ साथ हो तो लगेज में सामान से ज्यादा खाना होता है। समय की कमी होने से हमने सोचा कि बाहर बैठ कर खाने से बेहतर है सुरक्षित कार में ही नाश्ता कर लें। टैक्सी बुक करने के कुछ ही समय में राहुल ने फ़ोन किया और बेहद विनम्र आवाज़ में बताया कि वे एअरपोर्ट के करीब ही हैं और बस कुछ ही समय में पहुँच रहे हैं। ठीक समय पर आए और कार का दरवाज़ा खोल दिए। कार में बैठ कर उन्होंने लोकेशन एक बार और पूछी।


हमने भी पूछा, कि क्या हम कार में खा लें? कोई दिक्कत तो नहीं? उन्होंने मुस्कुरा कर कहा – ‘बिलकुल नहीं, आप आराम से खाइए’।

अपन तो इंदौर से हैं न भिया। अकेले खाते नि बनता और सबको खिलाने की आदत भी है – सबके साथ खाने में ही तो सेंव-जीरवन का भन्नाट स्वाद आता है। हमने फिर पूछा- ‘भैया, नाश्ता करेंगे?’


‘नहीं, आप लीजिए...’


‘ले लीजिये कुछ तो... सब है... पराठा, सेंव, परमल, अचार, जीरवन, पेठा... आप भी सुबह से गाड़ी चला रहे होंगे...’


‘नहीं-नहीं... आपने पूछा, उतना ही काफी है... इससे ही मेरा पेट भर गया... आजकल ड्राईवर लोगों से पूछता कौन है... आपने पूछा, इस लायक समझा, उसके लिए दिल से थैंक यू...’


‘थैंक यू की क्या बात भैया... पराठे का रोल बना देती हूँ...’


‘नहीं दीदी, आप खाओ आराम से। वैसे बहुत अच्छा लगा, आज भी ऐसे लोग हैं।’


‘ऐसे मतलब?’


‘बहुत कम होता है कि ऐसी सवारी मिले जो हम लोगों को ‘जस्ट अ ड्राईवर’ न समझे।’


‘जस्ट अ ड्राईवर?’


‘छोटे शहरों से लोग इस शहर में बड़े-बड़े सपने ले कर आते हैं, बड़े बनने के। मुझे इतने साल हो गए यहाँ। बड़े होते-होते वो लोग छोटी-छोटी बातें भूल जाते हैं। पहले दिन आएगा कोई तो सहमा सा कार में बैठेगा, बातें करेगा, शहर के बारे में पूछेगा... विनम्र होगा। कुछ समय बाद बस कार बुक करते हैं, कार में बैठते हैं, फ़ोन पर लगे रहते हैं या खिड़की से बाहर देखते हैं। कभी-कभी तो कार गन्दी कर देते हैं। और ऑनलाइन पेमेंट हो तो बस कार से उतर कर, जोर से दरवाज़ा बंद कर चल देते हैं। सबको काम की जल्दी है, और समय किसी के पास नहीं। फ़ॉर्मलिटी है सब यहाँ। कोई किसी को नहीं पूछता।आप कहाँ से हैं?’


‘इंदौर। हमारे इंदौर में ऐसा नहीं है... वहां सब, सभी से बात करते हैं, मदद करते हैं। घर में चाहे कोई सुधारक आए या बाहर कोई सब्जीवाले भैया बैठे हों, हम चाय-पानी तो पूछते ही हैं... साथ में… सड़कों पर कभी दुर्घटना हो जाए तो सारा मोहल्ला मदद के लिए जी-जान लगा देता है... किसी के घर शादी हो, सब उत्सव मनाते हैं। सब एक-दूसरे से जुड़े हैं वहां, भले ही अपरिचित हों... आप मीठा तो खा लो...’


‘नहीं, थैंक यू वन्स अगेन! वैसे, ये भावना आजकल कम ही देखने को मिलती है। छोटी सी बात है, लेकिन आज मेरा दिन अच्छा जाएगा!’

बातें करते-करते कब एक घंटा बीत गया पता नहीं चला। हम डेस्टिनेशन पर पहुंचे और भैया को फोटो के लिए निवेदन किया। उन्हें समझ नहीं आया कि उनसे क्या गलती हो गयी जो फोटो खींच रहे हैं... सहमे से वो बाहर आए।


‘मुझसे कोई गलती हो गयी क्या?’


‘नहीं! क्यों?’


‘मैंने कुछ कहा क्या? मुझे बस आप दोनों से मिल कर अच्छा लगा इसलिए इतना बोला मैं...’


‘हमें भी आपसे मिलकर उतना ही अच्छा लगा, इसलिए एक फोटो तो बनता है न!’


उनके चेहरे पर मुस्कान आ गयी।


‘दीदी, आप कहीं शेयर करोगे?’


‘हाँ! ज़रूर! आप कैसे देखोगे?’


‘अरे! मैं सब सीख चुका हूँ, फेसबुक, यूट्यूब, इन्स्टा...’


‘हाँ, बड़े शहर के बड़े आदमी बन गए हो आप भैया, है न?’


‘अरे नहीं... बातें तो छोटी-छोटी ही ज़रूरी है न, दीदी!’


कह कर वो मुस्कुरा कर कार में बैठे, और गुनगुनाते हुए चले गए।


बात छोटी सी है, लेकिन शायद “मिनी-मुंबई” में रहने वाले हम इंदौरियों की यही ख़ासियत है!


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