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माँ तेरी बहुत याद आती है

Anand Mohan JhaAnand Mohan Jha October 1, 2021
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बड़े-बड़े ज़ख्म आज हम यूँ ही सह लेते हैं

एक वक़्त था जब छोटी सी चोट पर भी मरहम माँ से लगवाया करते थे

 

जब ग़मों के बादल टूट के बरसते हैं

इस अनजान शहर में जब कोई अपना नहीं मिलता

जब खुद को भीड़ में भी अकेला पाता हूँ

जब आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है

माँ तेरी बहुत याद आती है

 

पहले आता नही था खाना बनाना

अब हर सुबह मैं खुद बनाता हूँ

पर जब भी मैं खाने बैठता हूँ

पुरानी यादें फिर ताजा हो जाती है

मैं फिर से अपने बचपन में चला जाता हूँ

कैसे तू मुझे अपने हाथों से खाना खिलाती थी

माँ तेरी याद रोज सताती है

माँ तेरी बहुत याद आती है

 

इस अंजान शहर में खो सा गया हूँ

दस बाय बारह के कमरे में सिमट के रह गया हूँ

देर रात जब घर आता हूँ फिर दर्द के मारे जब सर फटने लगता है

जब ठंडी पट्टी सर पर रखता हूँ

तब, तेरे आँचल तले सर रखने को जी करता है

माँ तेरे आँचल की खुशबु रुक-रुक कर रुलाती है

माँ तेरी बहुत याद आती है

माँ मेरे बगल वाले फ्लैट में भी एक आंटी रहती है

जो हू-ब-हूतेरी तरह दिखती है

संडे को सुबह जब बालकनी में अपने बेटे को चम्पी करती है

मेरा हाथ अपने आप मेरे सर के बालों को टटोलने लगता है

मैं फिर से अपने बचपन के दिनों में खो जाता हूँ

मेरे आँखों से अश्रुधारा अपने आप बह जाती है

माँ तेरी बहुत याद आती है

 

मैं आ जाऊँ छोड़ कर सब कुछ, हर रोज दिल यही कहता है

अपने वतन लौटने को दिल बहुत करता है

पर मजबूर हूँ वक़्त के हाथों

डर लगता है कहीं ये कोई गलत फैसला न हो

कहीं तुझसे मिलने की चाहत में,

वो सपना ना टूट जाये जो तेरे लिए सजाने आया हूँ

तेरे लिए वो घर बनाने का सपना

माँ ये सपना दर्द सहने की दवा बन जाती है

हर घड़ी हर पहर तेरी तस्वीर नज़र आती है

मेरे आँखों से निकला अश्रुधारा

तेरे आशीर्वाद का कवच बन मेरे इरादे मजबूत बनाती है

माँ तेरी बहुत याद आती है







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