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मालूम हो चला है

amit patelamit patel September 15, 2021
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मालूम हो चला है, मैं फिर से ठगा गया हूँ

कभी लब्जो की लाहज्जो में, कभी उम्मीदों की मृगतृष्णा में ।


मैं ठगा गया हूँ विश्वास की प्रपंचना में ।


हासिये पर मैं, खुद को फिर से पा रहा हूँ

सभी उम्मीदों को फिर से बिखरते देखता जा रहा हूँ।


कभी रचनात्मक अभिव्यक्ति कभी वादे पुराने

हर बार मुझे ठगा है तुमने इश्क़ के बहाने

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