अनमोल मुक्तक's image
Share0 Bookmarks 31 Reads1 Likes
कभी कभी खुद ही खुद को समझना पड़ता है
प्रेम गीत  ऊधौ  को  व्रज  में  गाना  पड़ता  है
दिन भर दर दर भटक रहे जो उदर पूर्ति के चक्कर में
शाम  ढले  हर  पक्षी  को  घर  आना  पड़ता  है॥ 

महा सिन्धु से गूढ़ ज्ञान के जो मोती चुन लाता है
जीवन के आदर्शों का जो सम्यक ज्ञान कराता है
नर सेवा नारायण सेवा का है जिसमें भाव प्रबल
अमल कमल सा मन के मानसरोवर में मुस्काता है॥ 

आसमान  में  उड़े परिंदा  पंखों  के  बलबूते पर
पर मोची की नजर टिकी होती है अक्सर जूते पर
जिसने भी संघर्ष किया जीवन में आगे निकल गया
चारा  तो पशु भी  खाता है  बँधा  हुआ  जो खूँटे पर॥ 
                                                   

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts