युद्ध के बंदी's image
Poetry5 min read

युद्ध के बंदी

Aman SinhaAman Sinha July 28, 2022
Share0 Bookmarks 16 Reads0 Likes

चेहरे पर पानी की छीटों से, मुझे ज़िंदा होने का ज्ञान हुआ

चौकी पर जो विस्फोट हुआ, मैं था उसमे अज्ञान हुआ 


आँख खुली तो मैंने देखा सब, अपने जैसे हीं चेहरे थे 

अपने जैसे वर्दी उनकी, अपने जैसे हीं पहरे थे 

 

चारदीवारी के अंदर सबकुछ, जाना पहचाना दिखता था 

 बोली, भाषा, चाल-चलन सब, अपनो जैसा लगता था 


कमरे में थे लोग कई, बस मेरी ही रखवाली में 

जगते मेरे भोजन आया, सजा के रक्खी थाली में 

           

मैं सोचा के अपने घर तक, साथी मुझे उठा लाए 

दवा कराई, देख-भाल की, शत्रु के पकड़ से छुड़ा लाए 


तभी अचानक तंद्रा टूटी, कंधे पर कुछ स्पर्श हुआ 

पीछे देखा एक उच्च अधिकारी, मेरे सर पर था खड़ा हुआ 

                       

उसे देखकर सावधान मुद्रा में, मैंए खुद को खडा किया 

पैर पटक कर सलाम ठोक कर, सीना अपना कडा किया 

                                   

मुझे देख वो थोड़ा ठिठका, और थोड़ा सा घबराया 

जय हिन्द के नारे का भी, जवाब ना डंग से दे पाया 

 

तभी उसकी वर्दी पर मैंने, कुछ अजीब सा देख लिया 

ध्वज की पट्टी लगी थी उल्टी, मैंने खुद को सचेत किया 


पर अपने चेहरे से मैंने, भाव न कुछ भी झलकाया 

समझ गया था क़ैदी हूँ मैं, पर थोड़ा ना घबराया 

                                   

वो बोला मुझसे विश्राम सिपाही, स्थिति का बखान करो 

कहाँ छूटे थे तुम टुकड़ी से, उस स्थान विशेष ध्यान धरो 


देख कर उसके हाव भाव को, मैं थोड़ा सा मुसकाया 

मेरी व्यंग्य हंसी के कारण, वो भी थोड़ा झल्लाया 

 

आदेश सुनाया फिरसे मुझको, गुस्से में आवेग में 

मैं मस्ती से पाँव पसारे, जाकर सो गया सेज में 


देख कर मेरी मनमानी फिर, उसने मुझको धमकाया 

मान भंग का दंड मिलेगा, मुझको फिर से समझाया 

 

मैं बोला कैसे फौजी हो, तुमको तनिक भी ज्ञान नहीं 

झंडे को उल्टा रक्खा है, देश का तुमको मान नहीं 


मेरी इतनी सी बात पर उसने, जैसे सबकुछ जान लिया 

चाल सभी बेकार हो चुके, एक क्षण में हीं भांप लिया 

 

अगले हीं पल चार सिपाही, मुझको घेरे खड़े हुए 

मुंह मेरा खुलवाने के जिद पर, जैसे वो थे अड़े हुए 


पहले तो डराया मुझको, फिर बुरी तरह से धमकाया 

देखकर मेरा अड़ियल पन फिर, बड़े प्यार से फुसलाया 


बोला अपना मुंह जो खोलो, पैसों से नहला दूंगा

गाड़ी-बंगला, नौकर-चाकर, घर तुम्हारा भर दूंगा 


पर जो तुमने मुंह ना खोला इन सबको तुम गवाओगे 

अपनी हठधर्मी के कारण, मुफ्त में प्राण गवाओगे 

 

अब सोचना है तुमको, तुम कौन सी राह अपनाते हो

करते हो आराम यहाँ पर, या खून से रोज़ नहाते हो 


हांथ मेरे बंधे हुए थे, पर चेहरे पर मेरे शान था 

देश के खातिर दर्द सहूँ तो, उसमे भी सम्मान था 


थूक गिरा कर थाली में, मैंने फिर उसको फटकारा 

कितना दर्द तू दे पाएगा, कह कर उसको ललकारा 


देखकर मेरा पागलपन, वो गुस्से से पूरा लाल हुआ 

दर्द मुझे देदे कर वो, मुझसे ज्यादा बेहाल हुआ  

 

कितनी भी खाई चोट मगर, मैं थोड़ा भी डिगा नहीं 

ऐसा कोई बचा नहीं था, पसीने से जो भिंगा नहीं 


कोड़े, चाकू ,कांटें, बर्छी, जाने किस-किस से भेदा था 

ऐसा कोई अंग बचा नहीं था, जिसे उन्होने ना छेदा था   

 

थक गया वो पीट-पीट कर, जा ज़मीन पर बैठ गया 

रख सिरहाने अपनी पेटी, लंबा होकर लेट गया 


टंगा रहा मैं ज़ंज़ीरों से, एक हांथ पर बंधा हुआ

खून थूकते, करहाते लेकिन, उन सबपर हंसता हुआ  

 

चार दिनों तक भूखा छोड़ा, प्यास न मेरी बुझने दी   

अंधकार में धकेल दिया, स्थान-दिशा ना समझने दी 


सोचा के मैं टूट जाऊंगा, भूख प्यास ना सह पाऊँगा 

हफ्तों का कमजोर सिपाही, मैं घुटनों पर आ जाऊंगा 

                       

लेकिन मैं था ढीठ बड़ा, अपने बल पर रहा खड़ा 

मैंने अब भी ज़िद ना छोड़ी, सीना ताने रहा अड़ा


भेज दिया फिर कारगृह में, कई बरस की बंदी में 

घोर यातनाएं सहे है मैंने, गर्मी, वर्षा, ठंडी में 

 

 एक दिन विस्फोट हुआ एक, दीवार पास की ढह गयी 

 खेत के पीछे तार लगी थी, सीमा की चौकी पर नज़र गयी 

  

मैं भागा उस अँधियारे में, ऊँचे नींचे रस्ते पर 

रुका ना जब तक पहुंचा जाकर, अपने देश की चौकी पर 


देख कर मुझको दौड़ के जाते, गोली की बरसात हुई 

एक हांथ को, एक टांग को, छेद कर गोली निकल गयी 


पर मेरी चौकी की पलटन ने, मुझको था पहचान लिया 

ये है अपने देश का बेटा, एक हीं झलक में जान लिया 

 

जैसे तैसे पार हुआ और, देश की मिट्टी छु बैठा 

अपनी मांंकी आंचल मे , फिर आँखें मूँदे जा लेटा


आँख खुली तो दिखा मुझे, फिर सब जाना पहचाना सा

राष्ट्रध्वज जो सिधा देखा, एहसास हुआ अपने घर सा

 


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts