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जब मैं चलता हूँ तो साथ साथ वो भी चलती है

जहां मैं मुड़ा कहीं मेरे साथ वो भी मुड़ जाती है

रूप रंग में हाव-भाव में बिल्कूल मेरे जैसी है

मैं तो दीखता हूँ हर जगह वो कहीं-कहीं छुप जाती है

सूरज हो या चाँद फलक पर इसको फर्क नही पड़ता

खोली हो या हो कोई हवेली इसको डर नहीं लगता

आगे पीछे ऊपर निचे ये कही भी हो सकती है

टेढ़ी मेढी छोटी मोटी ये कैसी भी हो सकती है


ब्राह्मण हो या राजपूत हो या फिर कोई हरिजन हो

चाहे कोई हो गोरा काला पराया या परिजन हो

उंच-नीच का भेद-भाव का इस पर कोई असर नहीं

जात-पात और आन-मान की इसको कोई खबर नहीं


ये ना देखे मंदिर मस्जिद गिरजा घर या गुद्वारा हो

मुस्लिम का हो मय खाना या हिन्दू की मधुशाला हो

लोग अलग हो जितने चाहे सबको एक दिखलाती है

सबकी एक ही हालत है हर बार यही समझाती है


पास है पर साथ नहीं वो धरती पर है आकाश नहीं

उजियारे से है इसकी यारी तिमिर से होती बात नही

कहीं कभी जो हम छूप जाए या अँधेरा छा जाये

बादल भी आ जाए तो फिर ये कहीं पर खो जाए

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