कुछ अनकही सी's image
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अंजाना सफर तनहाई का डेरा

उदासी का दिल मेंं था उसके बसेरा

साँवली सी आंखो पर पालकों का घेरा

भुला नहीं मैं वो चमकता सा चेहरा


आंखे भरी थी और लब सील चुके थे

दगा उसके सीने मे घर कर चुके थे

था कहना बहूत कुछ उसको भी लेकिन

धोख़े के डर से वो लफ्ज जम चुके थे


हाले दिल चेहरे पर दिखता था यू हीं

के ग़म को छुपाने की कोशि श नहीं थी

दिल चाहता तो था संग उसके चलना

मगर साथ चलने की कोशि शनहीं थी


कहा कुछ नहीं पर समझा दिया सब

ना बाकी रहा था कुछ भी कहीं अब

बेबस उस हंसी की होठों पर रख के

वो फिरती रहेगी उदासी मे कब तक?


घड़ी दो घड़ी की वो हमसफर थी

बस चंद लम्हों की वो राहे गुज़र थी

थी अपनी भी मंज़ि ल जूदा उससे लेकिन

वो यादों मे रहने की ज़िद कर चुकी थी


थी रोने की कोशिश पुरजोर उसकी

साँसे भी चलने को राजी नहीं थी

होंठ काँपते थे कुछ इस तरह से

आंखो से आँसू बहने लगी थी


आंखो से मेरी जो आंखे उसकी लड़ी तो

दर्द उसके दिल सब छलका गयी वो

गलत था वो दिलबर जिसे चाहा था उसने

संगत को अपने परख न सकी वो

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