खुद की तलाश's image
Poetry2 min read

खुद की तलाश

Aman SinhaAman Sinha April 21, 2022
Share0 Bookmarks 51 Reads0 Likes

खुद से रू-बरू होने की सूरत तो बने

कभी दिल मैं भी खोल सकूँ महूरत तो बने

भरा है लावा दिल मे इतना, पिघल जाऊँ मैं

कभी फटकर निकल जाऊँ ऐसी नौबत तो बने

 

है यूं तो कई बात जो है सुनानी तुमको

नज़रों से तेरे गिरकर नहीं रहना मुझको

कैसे लौटा के ले आऊँ अपने पास तुझे

फिर पहले सा वही जज़्बात जगाना है मुझे 


तेरी हर जिल्लत है मंजूर मुझे

दिये है जो भी इल्ज़ाम सब है कुबूल मुझे

तुझे खो देने का डर ही काफी है मेरे लिये

बिना तेरे और जीना नहीं है मंजूर मुझे


तुझे पता है मैं नहीं मेरा गुरूर बोलता है

जो मूझपर है चढ़ा शोहरत का शुरुर बोलता है

मुझे नहीं पता कितनी दफा मैंने तुझे तोड़ा है

नहीं परवाह तेरी होके मगरूर सरफिरा बोलता है  


मुझे मालूम नहीं के मैं क्या बोल गया ?

अनजाने मे ही मैं दिल ये तेरा तोड़ गया

ना जाने क्यों इतनी कड़वाहट भरी है मेरे अंदर

जब मुंह खोला मैने कोई ज़हर घोल गया


बड़े सुकून से बैठा था मैं खुदको समेटे हुए

ना जाने तेरे आने क्यूँ हलचल सी हो गयी

चैन जितनी भी थी दिल के गलियारी में मेरी

तेरी आहट जो भी मिली जाने कहाँ सब खो गयी








No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts