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खयालो में मेरे खयाल एक आता है

भरम मेरा मुझको यूं भरमा के जाता है


दिखता नहीं है पर वो बातें करता है

नहीं साथ मेरे पर महसूस होता है


है वो झोंका हवा का ये है अंदाज़ मेरा  

नहीं जानती मैं अब क्या है अंजाम मेरा


वहां घूमता है जहां चाहता है

गगन हो फलक हो ये सब चूमता है


जो देखा कहीं पर तो पहचान लूंगी

यही मर्ज़ मेरा है मैं जान लूंगी


मिला जो कही तो फिर जने ना दुंगी

के बाहों से उसको मैं थाम लूंगी

 

मैं अंजान उससे पर वो जानता है

वो है बस यहीं पर ये दिल जानता है


भेद सकता है वो दीवारों को मन के

विचारों को मेरे वो भांपता है


नहीं जानती मैं वो नर है या नारी

नज़र पर टिकी है अब उम्मीद सारी


वो साया है कोई या ज़िंदा सा तन है

अब उसके ही बस मेरा ये मन है

 

अभी तक उसे मैंने समझा नहीं है

देखा नहीं है और परखा नहीं है


कहूँगी नहीं कुछ जुबान से मैं अपने

फिसलने न दूँगी मैं जज़्बात अपने  


पकड़ में जो आए तो मैं बाँध दूँगी

मेरी हर हरज़ का मैं हिसाब लूंगी


जलाकर उसे राख मैं तब करूंगी

समाधी पे उसके हवन जब करूंगी 






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