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Aalok ShrivastavPoetry1 min read

ये जो साल अच्छा था

Aman Pratap SinghAman Pratap Singh October 18, 2021
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रात की गहराइयों से क्या पूछूं
सबनम आई थी समा जलाने
या गई मिट्टियों की प्यास बुझाने

सवालों के बस्तर, है बंधे मन में
जी ना लग रहा, इसके भजन में

भींगे भींगे अरमान है 
जंग लगी कमान है
ना पूछो क्या फरमान है
खतरे में पड़ी जान है

टहनियों पे बूंदे उछल रही है
बदन के ताप से मचल रही है
कोई आए बुझाए इस तड़पन को
आंखों को खूब-रु की कमी खल रही है

उसके ज़वाब से, 
हमारा सवाल अच्छा था
हमारे उधरे बदन से,
उसका रेशमी बाल अच्छा था
हम इस्तकबाल में थे उसके
की हो जाए हमारी
मगर निगाहों के हरकतों ने
समझाया हमें की, 
हमारे जाल बिछाने से पहले,
उसने किया हमारा इस्तेमाल अच्छा था
ख़ैर शिकस्त इश्क़ में हुआ
जिंदगी तो है एक जुआ
हां मगर चेहरे चमक गए थे हमारे
वो दशकों बाद, ये जो साल अच्छा था.. 
~अमन


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